Tuesday, 23 August 2011

अ - हिंसा

                                 अ - हिंसा

देश को डावांडोल किए तुम, हम तो कलंकित हो ही गए .
सम्पन्नता की विरासत में, हमसब विपन्न भी हो  ही गए.

   निज के उत्थान पर जोर दिया,  देश को तुम अवनत ना करो.
   और नहीं-अब बस भी करो, देश को तो शर्मसार ना करो.

देश   को निर्धन कर ही दिया, अब बची लंगोटी - बेचोगे क्या ?
सम्मान तो अब कुछ रहा ही नहीं, अपमान का मान भी बेचोगे क्या ?

    हम चाहने वाले हैं तेरे, मेरी सुनवाई भी होगी क्या ?
    बड़े लाड से देश का डोर दिया, अब रथ की बेचाई भी होगी क्या ?

अहिंसा के बल पर हमने, निज देश का अभिमत जताया है.
गाँधी को ही अबतक अपनाया, पर आज़ाद को नहीं भुलाया है.

   रक्षक होकर तुम भक्षक बने, अब संरक्षा पर वार ना कर.
   गर नेताजी को अपनाया, तो-अपने कल की खैर ना कर.

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